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शरद पूर्णिमा पर क्यों रखती है महिलाएं व्रत ?

13 अक्टूबर 2019 (रविवार)

पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ - प्रातः काल 12:36 बजे (13 अक्टूबर 2019)

पूर्णिमा तिथि समाप्त - को प्रातः काल 02:38 बजे (14 अक्टूबर 2019)

तिथि 30, आश्विन, शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा, विक्रम सम्वत

 

शरद पूर्णिमा का व्रत आश्विन माह की पूर्णिमा को किया जाता है ! इसे शरद पूर्णिमा के आलावा सुहाग पूनम भी कहते है ! इस व्रत में महिला दिन भर भूखी रहती है उपवास करती है ! इस व्रत में तुलसी क्यारे की पूजा करते है तथा उसपर पूनम माता और चाँद, सूरज बनाकर उसकी पूजा की जाती है पूजा करके सुहाग सामग्री जैसे (चूड़ा, बिछिया, मेहंदी, बिंदिया, काजल इत्यादि) चढ़ाएं और सुहाग सामग्री व्रत करने वाली सुहागनि महिला को दे ! रात को चन्द्रमा निकलने के बाद चाँद की पूजा करे अथार्त देने के बाद चावल की खीर खाकर अपना व्रत तोड़े !

शरद पूर्णिमा की व्रत कथा :-

एक राजा अपनी रानी सहित सुख पूर्वक राज्य करते थे ! राजा अपनी प्रजा की सुख शांति का अपनी संतान के सामान ख्याल रखते थे, और संतान के समान ही पालन करते थे पर राजा की कोई संतान नहीं थी ! एक दिन प्रात: काल को राजा जब घूमने निकले तो एक मालण फूल तोड़ रही थी ! उसने राजा को देखते ही थूक दिया ! उसकी इस हरकत को राजा ने देख लिया ! इसके बाद राजा ने मालण को बुला के पूछा "तुमने हमे देखकर क्यों थूका?" तो मालण घबरा गई उसने सोचा की अगर अनदाता को पता चल गया तो यह मुझे फांसी पर चडा देगे तो उसने बहाना बनाया कि अन्नदाता मेरी क्या औकात कि मैं आप को देखके थुकु वो तो मैंने तम्बाकू खा रखा था तो उसे थूका पर राजा को उसके थूकने के अंदाज़ से राजा को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ, फिर राजा ने उसको सच - सच बोलने को कहा तब मालण दर गई पर मालण ने उसे फिर भी नहीं बताया तो राजा ने उसे बोला तुम्हें डरने की कोई जरुरत नहीं है में तुम्हे कुछ नही कहूँगा तो मालण बोली की अगर आप मुझे कोई दंड और कोई जुरमाना नहीं लगाओगे तो मैं बताऊंगी तो राजा ने बोला की में तुम्हे कुछ नही कहूँगा पर सच तो बताओ तो इसके बाद मालण ने बोला कि राजा साहब सुबह - सुबह अगर कोई बाँझ - बांझन का मुँह देख ले तो उसको दिन भर रोटी पानी नही मिलती और मैंने आप का मुंह देख लिया तो मुझे भी दिनभर खाना नहीं मिलेगा इसी बात से मेरे मन में इस तरह का ख्याल आया तो मैंने थूक दिया !

राजा इन बातों पर विश्वास नहीं करते थे तो राजा ने कहा कि ऐसा नहीं होता है चलो आज ऐसा करते है की तेरा न्योता आज हमारे महल में है ! हम देखते है की आज तेरे को रोटी पनि कैसे नही मिलता है ! यह बात सुनकर मालण ब हूँत खुश हो जाती है ! तो वो घर जाकर अपने पति से बोलती है की आज तो राजा साहब ने मुझे अपने घर में खाने के लिए न्योता दिया है ! आज तो मैं महल में खाना खाने जाऊगी ! यह बात सुनकर उसका पति एक दम आग बगुला हो जाता है उसे गुस्सा करने लगता है और मरने लगता है और उसपे लांछन लगने लग जाता है की तुम तो राजा के साथ खाती होगी और क्या क्या करती होगी और उसे जोर से डांटता है की अगर तुम घर से बहार गई तो तेरी टांगे तोड़ दूँगा और यह कहते हुए उसे कमरे में बंद कर देता है और ताला लगा देता है और रोटी पानी कुछ भी नहीं देता और चले जाता है ! अब इधर खाने के टाइम पर जब मालण खाना खाने नहीं आती है तो राजा अपने नौकर को उसके घर भेजता है पता करने के लिए की मालण क्यों नही आई तो नौकर को पता चलता है की उसके पति ने उसे मारा पीटा और रोटी पानी नहीं दिया और कमरे में भी बंद कर दिया ! यह बात नौकर राजा को जाकर बताता है तो राजा को यह बात सुनकर ब हूँत दुःख होता है ! तो राजा सोचता है उसको खाना तो देना है वार्ना उसने जो बात सोची थी वो सच हो जाएगी !

तो राजा एक थाल लगवाता है उसमें सारा खाना रख कर नौकर से कहता है की उसके घर दे आओ तो नौकर थाल लेकर उसके घर जाता है और उसके दरवाजे के पास थाल रखता है तभी एक चील उस थाल पर झपटा मारती है और थाल नीचे गिर जाती है और सारा खाना ख़राब हो जाता है ! जब राजा को यह बात पता चलती है तो राजा को भी समझ में आ जाता है कि मालण ने सही बात की थी कि जो मेरा चेहरा देखले तो उसको रोटी नहीं मिल सकती ! तो राजा यह बात सोच कर खूब दुःखी होता है कि लोग उसका चेहरा नहीं देखना चाहते ! यह बात सोचकर वह बहुत दुखी हो जाता है और सोचता है की ऐसे जीने से तो मरना बेहतर है ! तो वो मरने के लिए एक सरोवर में जाता है पर जैसे ही राजा सरोवर में डूबने लगता है तो पूनम माता प्रकट होती है और राजा से पूछने लगी कि तुझे ऐसा कौन सा दुःख है की तू यह पाप कर रहा है और मेरे सरोवर को भी पाप का भागीदारी बनाएगा तो राजा पूनम माता से कहते है की हैं पूनम माता मेरी कोई संता नही है और लोग भी मेरा मुँह नहीं देखना चाहते ! मैं इसलिए मरना चाहता हूँ तो पूनम माता कहती है की यह बात सही है की पुत्र तेरे भाग्य में कोई संतान नहीं है पर मैं तेरी सेवा से प्रसन्न हूँ ! क्यूंकि राजा बहुत ही दानि और अपनी प्रजा का बहुत ही ख्याल रखता था ! पूनम माता कहती है की मैं तेरी सेवा से बहुत प्रसन्न  हूँ पर मैं तेरे को 12 वर्ष के लिए एक पुत्र दे दूँगी अब तू अपने महल में जा राजा अपने महल में चला जाता है और रानी को सारी बात बताता है ! तब रानी कहती है ठीक है चलो 12 साल के लिए ही सही पर लोग हमे बाँझ - बांझन तो नहीं कहेंगे तो राजा मान जाते है और समय आने पर रानी जी के एक पुत्र होता है ! जैसे ही राजा रानी के पुत्र होता है !

राजमहल मैं और पुरे राज्य में खुशियां मनाई जाती है और गरीबों को दान दिया जाता है ! बधाईया बटवाई जाती है रोज महल में नए - नए उत्सव होते है चारों तरफ खुशहाली ही खुशहाली होती है ! समय के साथ - साथ राज कुमार बड़ा होने लगता है ! अब 11 वर्ष फटा - फटा बीत जाते है राजकुमार के साथ राजा और रानी जी को समय का पता ही नही लगता है ! अब रानी जी को चिंता होने लगती है कि 1 वर्ष के बाद हमारा बेटा चला जाएगा पूनम माता इसको वापिस ले लेगी ! तो रानी सोचती है की क्यों न इसका विवहा करवा दे तो महल में बहू आ जाएगी और महल की रौनक भी बनी रहेगी कोई तो रहेगा महल में रानी जी राजा जी को यह बात बताई तो राजा जी पहले तो मन कर देते है ! तो रानी जी समझाती है हो सकता है उस कन्या के भाग्य से हमारे बेटे की जिंदगी बार्ड जाए तो राजा जी भी तैयार हो जाते है ! राजा जी खुद ही इस कार्य के एक योग्य कन्या ढूंढने निकल पड़ते है ! राजा जी चलते - चलते एक गाँव में पहुंचे तो एक स्थान पर कुछ लडकिया मिटटी से घर बनाकर खेल रही होती है ! शाम हो जाने के कारण कुछ ने अपने घरों को मिटा दिया था, पर एक लड़की ने अपना घर नही मिटाया जब उसकी सहेली उसका घर मिटाने लगी तो उसने उन्हें भी माना कर दिया की हमारे हाथ से बनाया घर ही हम मिटाएंगे तो हमारा घर बार ही मिट जाएगा ! इसलिए मैं मेरा घर किसी को भी नही मिटाने दूगी ! जब राजा ने उसकी यह बात सुनी तो राजा को यह लड़की बहुत समझदार लगी और राजा उसके पीछे - पीछे उसके घर गया और वह जाकर राजा ने उस लड़की के पिता से अपने पुत्र के लिए उसका हाथ मांगता है ! तब लड़की के पिता बोले हम तो एक गरीब किसान है और आप राजा है ! आपका और हमारा क्या मेल पर राजा ने उसे समझा बुझा कर विवहा के लिए मना लिया ! शुभ लगन में दोनों का विवहा कर दिया !

अब कुंवर और कावराइन बड़े आनन्द से रहने लगते है ! जैसे - जैसे 12 वर्ष नज़दीक आने लगे राजा रानी चिंतित रहने लगे ! कावराइन ने कई बार जब अपनी सास को चिंतित रहते देखा तो एक दिन उसने हिम्मत करके पूछा की आप क्यों चिंतित हो कवराईं बोली क्या मैं आप को पसंद नही हूँ तो रानी जी बोली की ऐसी कोई बात नहीं है पर जब कावराइन जिद पर अड़ जाती है तो रानी जी को उसे सारी बात बतानी पड़ती है ! यह बात सुनकर कावराइन जी भी चिंता में पड़ गई फिर विचार करके उसने रानी जी से कहा की हमारे लिए नगर के बाहर एक महल बनवा दे और उसमे हमारा रहने और खाने पीने की व्यवस्था कर दो ! रानी जी ने सोचा कि कुँवर जी तो वैसे ही कुछ दिन के मेहमान है पर कावराइन जो कहा रही है वह भी करके देख लेते है ! ऐसा सोच कर रानी जी ने राजा जी से कहकर उनके लिए नगर के बाहर एक महल की व्यवस्ता करवा दी ! उसमे कुवर और कावराइन रहने लगे ! कावराइन प्रत्येक पूनम का व्रत करने लगी ! जब सुहाग पूनम का दिन आया तो उसने तो अपने पति के लिए विधि विधान के साथ व्रत रखा और पूनम माता की पूजा की तथा आशीर्वाद मैं अपने पति की लम्बी आयु मांगी ! रात को कुँवर जी के सोने के बाद कावराइन ने पलंग के चारो पायो के खुट पर चौकी लगाकर उनपर अग्नि, जल, अन्न और धन की स्थापना की ! उधर पूनम माता ने दूतों को कुवर के प्राण लेने के लिए भेजा तो दूत चौकी लगी देख कर वापिस लोट गए और पूनम माता को बता दिया तो उन्होंने कहा कल मैं स्वयं जाऊगी !

दूसरे दिन कावराइन ने महल के पहले चढाव (सीडी) पर जल भर के रख दिया, दूसरे चढाव पर पहनने के लिए सुन्दर वस्त्र रख दिए, तीसरे चढाव पर सुहाग की सामग्री और चौथे चढाव पर खीर का कटोरा रख दिया और कावराइन स्नान करके पूर्ण सुहाग सामग्री पहनकर दरवाजे पर खड़ी हो जाती है ! जब पूनम माता वह आती है तो पानी देखकर उनका स्नान करने का मन हुआ और उन्होंने स्नान किया और स्नान करते ही माता जी की थकान दूर हो गई और उन्होंने मुँह से आशीष निकली की तेरा सुहाग अमर रहे स्नान के बाद सुन्दर - सुन्दर वस्त्र धारण किए और खुश होकर पुत्र वती होने का आशीष दिया ! अब जैसे ही आगे बड़ी सुहाग की सामग्री देख कर माता जी ने अपना श्रृंगार किया और आभूषण पहने और आशीष देते हुए कहा मुझे श्रृंगार सामग्री देने वाली तेरा सुहाग अमर रहे और आगे बढ़ने पर खीर का कटोरा देखते ही उनकी भूख जाग उठी और माता जी ने पेट भर कर खीर खाई और आशीर्वाद दिया की मुझे खीर खिलाने वाली तेरा भंडार हमेशा भरा रहे ! अब जैसे ही माता जी ने दरवाजे के अंदर प्रवेश किया वैसे ही कावराइन माता जी के पैर दबाने लगती है माता जी खूब आशीर्वाद देती है

इसके बाद माता जी कुवर जी को लेकर जाने लगती है तो कावराइन माता के आगे हाथ जोड़ती है और कहती है ! माता आप अगर कुँवर जी को ले जाओगे तो आपने अभी जो आशीर्वाद दिए वो खली चले जाएगे वह कैसे पुरे होंगे ! तब माता जी कहती है की मैं तेरी परीक्षा ले रही थी कि तू कितनी बुद्धि मान है ! मेरे दिए हुए वचन कभी खाली नहीं जाते और यह कहकर माता जी उसे पुणे आशीर्वाद देकर वह से चली जाती है ! उसके बाद कावराइन ने अपने सास - ससुर को यह खबर भिजवाई, तो राजा जी और रानी जी ने बड़ी धूम धाम से अगवानी करके उनको महल में ले आए और महल में खूब खुशियां मनाई गई ! उसके बाद से सुहागन अपने सुहाग की रक्षा के लिए यह व्रत रखती है !