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जानिए नरक चतुर्दशी का महत्व , कथा और पूजा विधि !

नरक चतुर्दशी का महत्त्व :-

दीपावली के ठीक एक दिन पहले जो मनाए जाने वाली चीज़ है वह है नरक चतुर्दशी और इस बार दीपावली और नरक चतुर्दशी दोनों एक ही दिन है मान्यता यह है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की विधि विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है ! इसी दिन शाम को दीप दान की प्रथा है जिसे यमराज के लिए किया जाता है ! इस पर्व का जो महत्त्व बताया गया है उस दृष्टि से भी यह काफी महत्वपूर्ण त्यौहार है ! यह पांच पर्वों की श्रृंखला के मध् में रहने वाला त्यौहार है ! दीपावली से दो दिन पहले धनतेरस होता है फिर नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली होती है ! इसे छोटी दीपावली इसलिए कहा जाता है क्यूंकि दीपावली से एक दिन पहले रात के वक़्त उसी प्रकार दीए की रोशनी से रात के तीनेर को रौशनी से दूर भगा दिया जाता है जैसे दीपावली की रात को चलिए जानते है इसके पीछे की कथा के बारे में !

नरक चतुर्दशी की कथा :-

एक कथा के अनुसार आज के दिन ही भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी और दुराचारी दु्र्दांत असुर नरकासुर का वध किया था और सोलह हजार एक सौ कन्याओं को नरकासुर के बंदी गृह से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया था। इस उपलक्ष्य में दीयों की बारात सजाई जाती है।

इस दिन के व्रत और पूजा के संदर्भ में एक दूसरी कथा यह है कि रंति देव नामक एक पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा थे। उन्होंने अनजाने में भी कोई पाप नहीं किया था लेकिन जब मृत्यु का समय आया तो उनके समक्ष यमदूत आ खड़े हुए। यमदूत को सामने देख राजा अचंभित हुए और बोले मैंने तो कभी कोई पाप कर्म नहीं किया फिर आप लोग मुझे लेने क्यों आए हो क्योंकि आपके यहां आने का मतलब है कि मुझे नरक जाना होगा। आप मुझ पर कृपा करें और बताएं कि मेरे किस अपराध के कारण मुझे नरक जाना पड़ रहा है। 
यह सुनकर यमदूत ने कहा कि- हे राजन् एक बार आपके द्वार से एक ब्राह्मण भूखा लौट गया था, यह उसी पाप कर्म का फल है। इसके बाद राजा ने यमदूत से एक वर्ष समय मांगा। तब यमदूतों ने राजा को एक वर्ष की मोहलत दे दी। राजा अपनी परेशानी लेकर ऋषियों के पास पहुंचे और उन्हें अपनी सारी कहानी सुनाकर उनसे इस पाप से मुक्ति का उपाय पूछा। तब ऋषि ने उन्हें बताया कि कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करें और ब्राह्मणों को भोजन करवा कर उनके प्रति हुए अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करें। राजा ने वैसा ही किया जैसा ऋषियों ने उन्हें बताया। 
इस प्रकार राजा पाप मुक्त हुए और उन्हें विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ। उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति हेतु भूलोक में कार्तिक चतुर्दशी के दिन का व्रत प्रचलित है।​

नरक चतुर्दशी पूजा विधि :-

नरक चतुर्दशी पूजा की सामग्री - श्री गणेश व् श्री लक्ष्मी माँ की प्रतिमा 11 या 21 चाँदी के सिक्के, एक थाली, सरसो का तेल, रुई की बत्ती, रोली, चावल, धुप, कोयला,कच्चा दूध, चौकी, आसन, लाल या पिले रंग का कपडा 5 प्रकार की मिठाई आदि ! इस दिन जल्दी सुबह उठकर अपने नित्यकर्म से निवृत्त होकर साफ़ सूत्रे कपडे पहने ! लिए गए सिक्के को रोली मिले कच्चे दूध से साफ़ करे ! उसके बाद उसे साफ जल से या गंगा जल से धोले ऐसा करने के बाद उन सब सिक्को को एक थाली में नया कपडा बिछा कर सजा ले, अब एक चौकी पर रखले पर आपको ध्यान रहे की पूजा करते समय आपका मुँह पूर्व दिशा की और होना चाहिए, चौकी पर लाल या पीला कपडा बिछाकर श्री गणेश और श्री लक्ष्मी माँ की प्रतिमा को रखे ! ऐसा करने के बाद उन साब सिक्को को एक थाली में नया कपडा बिछा कर सजा ले व् थाली के बीच में चौमुखा दीपक रखे, और चारो और 11 या 21 दीपक (सरसो के तेल के) सजा कर जला दे ! श्री गणेश जी और श्री लक्ष्मी माँ को रोली का तिलक लगाकर चावल चढ़ाए ! चाँदी के सिक्को व् दीपक पर रोली के छींटे मरे, इसके बाद धुप जलाए ! थाली में 7 दीपक व् चौमुखा दीपक छोड़कर बाकी के दीपक को घर के मुख्य स्थानों पर रख दे !