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पशुपतिनाथ: यहां है अनोखा चार मुखों वाला शिवलिंग! (Pashupatinath Temple)

नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर को अनेक मंदिरों के बीच सबसे प्रमुख माना जाता है। ‘पशुपति’ दो शब्दों से मिलकर बना है – पशु मतलब ‘जीवन’ और ‘पति’ मतलब स्वामी, अर्थात ‘जीवन का स्वामी’। चार मुखों वाला पशुपतिनाथ का शिवलिंग अपने आप में विशेष है। इसके चार मुख चार दिशाओं को प्रदर्शित करते हैं, 'तत्पुरुष',  'सद्ज्योत, 'वामदेव' तथा 'अघोरा' क्रमशः पूर्व, पश्चिम, उत्तर तथा दक्षिण दिशा के मुखों के प्रचलित नाम हैं। सामान्यजन की ऐसी मान्यता है कि यह लिंग वेद लिखे जाने से पूर्व ही अस्तित्व में आ गया था। जिससे जुडी हुई कई पौराणिक कथाएं हैं, इनमे सबसे मान्यताप्राप्त कहानी इस प्रकार है - ​​

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पांडव निकले थे शिव की खोज में :-

कुरुक्षेत्र में लड़ी गयी महाभारत की विनाशक लड़ाई में अपने ही सगे सम्बन्धियों की हत्या करने की वजह से पांडव पश्चाताप की अग्नि में जल रहे थे। इस आत्म ग्लानि से मुक्ति पाने के लिए श्री कृष्ण ने उन्हें शिव की शरण में जाकर क्षमा मांगने का सुझाव दिया। और खुद को इस दोष से मुक्त करने के लिए पांडव शिव की खोज में कैलाश निकल पड़े।

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शिव यह जानते थे की पांडव उनसे क्षमा प्रार्थना के लिए आ रहे हैं और वे इतनी सरलता से उन्हें क्षमादान नहीं देना चाहते थे। इसलिए वे एक वृषभ (बैल) का रूप धरकर पशुओं के बीच चले गए। जब पांडवों ने शिव को वहां नहीं देखा तो वे उनकी खोज करने लगे और उन्होंने पशुओं के झुण्ड में जब एक वृषभ को देखा तो वे समझ गए की यही शिव हैं और उनसे छिपने की कोशिश कर रहे हैं। पांडव शिव के पास जाने लगे तो वह वहां से भाग गए, यह देख भीम भी उनके पीछे पीछे दौड़ गए। अब शिव उसी रूप में धरती के अंदर समाने लगे, किन्तु वह पूर्ण धरती के भीतर जा पाते उस से पूर्व ही भीम ने उन्हें पूंछ से पकड़ लिया।  इस प्रकार शिव जी का अर्ध भाग भूमि के अंदर तथा शेष भाग भूमि के बाहर रह गया, और शिव को बाहर निकल कर अपने असल स्वरुप में आना पड़ा। पांडवों के क्षमा मांगने पर शिव जी ने उन्हें क्षमा कर दिया। जिस स्थान पर भीम ने शिवजी की पूँछ को पकड़ा था, उसे केदारनाथ तथा जिस स्थान पर उनका मुख धरती से बाहर आया उसे पशुपतिनाथ कहा जाता है।

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नहीं मिलती पशु योनि :-

शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक पशुपतिनाथ मंदिर को केदारनाथ का ही हिस्सा माना जाता है। कहा जाता है यह केदारनाथ और पशुपतिनाथ मिलकर पूर्ण होते हैं। नेपाल की राजधानी काठमांडू से 3 किलोमीटर दूर उत्तर-पश्चिम की ओर देवपाटन गांव में बागमती नदी के तट पर स्थित है पशुपतिनाथ मंदिर। पशुपति की मान्यता है की यह प्रभु शंकर के दर्शन करने वाले को पशु योनि प्राप्त नहीं होती। किन्तु एक बात का ध्यान रखना आवश्यक है, वह ये की यहां जाने वाले व्यक्ति को सबसे पहले नंदी के दर्शन नहीं करने चाहिए, क्योकि ऐसा करने से उसे पशु योनि प्राप्त होती है।  

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हिन्दू धर्म का प्रमुख स्थान :-

पशुपतिनाथ मंदिर के बाहर आर्य घाट नाम से जाना जाने वाला घाट है, प्रारम्भ से ही इस मंदिर में केवल इसी घाट का पानी मंदिर के अंदर ले जाने की अनुमति है। इस घाट के पानी के अलावा कोई दूसरी जगह का पानी अंदर ले जाने की अनुमति नहीं है। पशुपतिनाथ मंदिर कब स्थापित किया गया इसकी कोई लिखित जानकारी उपलब्ध नहीं है। किन्तु लोककथाओं में कहा जाता है की 3 शताब्दी ईसा पूर्व में सोमदेव राजवंश के पशुप्रेक्ष द्वारा इस मंदिर का निर्माण किया गया था। पशुपति संप्रदाय की संभावना इसकी नींव से संबंधित थी।