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जानिए कौन करना चाहता था सम्पूर्ण सर्प जाती का विनाश? और क्यों?

महाभारत के विध्वंशक युद्ध के पश्चात् पांडवों ने लगभग 35 वर्षो तक शांतिपूर्वक राज किया। किन्तु श्री कृष्ण की मृत्यु के बाद राज पाठ त्याग कर पांडव भी द्रौपदी सहित हिमालय चले गए। और सारा राज्यभार अभिमन्यु पुत्र परीक्षित को सौंप गए। परीक्षित ने भी पांडवों की भांति धर्मपूर्वक शाषन किया।​

परीक्षित की भूल :-

एक दिन राजा परीक्षित सैनिकों के साथ शिकार पर जंगल गए थे। किन्तु शिकार न मिलने के कारण वह बहुत दूर निकल आये। उन्हें अत्यंत प्यास लगी थी किन्तु कोई जलाशय आस पास नहीं था। घने जंगल में उन्हें एक आश्रम दिखा, वह ऋषि शमीक का आश्रम था। राजा परीक्षित आश्रम में गए, किन्तु ऋषि उस समय ध्यान लगा कर बैठे थे इसलिए उन्होंने परीक्षित का स्वागत नहीं किया। किन्तु यह परीक्षित को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा। उसे लगा की ऋषि उसका अपमान कर रहे हैं। वह अत्यंत क्रोध से भर गया। चूँकि ऋषि हत्या महापाप है इसलिए वह उन्हें मृत्यु दंड नहीं दे सकता था। उसने अपमान का बदला लेने के लिए पास ही एक मरे हुए सांप उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया। ​

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परीक्षित के वहाँ से जाने के बाद ऋषि शमीक के पुत्र ऋषि श्रृंगी वहां आये और उन्हें अपने पिता के इस अपमान का पता चला तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने राजा को श्राप दिया की मेरे पिता का सर्प द्वारा अपमान करने वाले की 7 दिनों में सर्प दंश से मृत्यु हो जायगी।

तक्षक की योजना :-

शाप का हाल सुनकर कश्यप नामक ऋषि (सर्प-विष-चिकित्सक) राजा से मिलने को चले। उन्होंने सोचा कि राजा को साँप द्वारा डँसते ही, वह तंत्र-मंत्र और औषधियों द्वारा राजा को ठीक करके मालामाल हो जायँगे। किन्तु रास्ते में उनकी भेंट सर्पराज तक्षक से हो गई। उनके राजा से मिलने का प्रयोजन जान तक्षक ने ऋषि की परीक्षा ली और कहा कि वो साबित कर के दिखाएँ कि उनके मन्त्र हर प्रकार के विष को निष्फल कर सकते हैं। ऋषि भी मान गए, तब तक्षक ने एक वृक्ष पर अपना विष डाल दिया, देखते ही देखते हरा भरा वृक्ष विष के प्रभाव से जल गया और निष्प्राण हो गया। तब कश्यप ऋषि ने मन्त्र पढ़ते हुए उस वृक्ष को छुआ और छूते ही वह वृक्ष फिर से हरा भरा हो गया। तब तक्षक समझ गया की ऋषि किसी भी विष को निष्फल कर सकते हैं। उसने ऋषि से कहा कि राजा का विष उतारने के झगड़े में आप क्यों पड़ते हो। आपको सम्पदा चाहिए सो मैं यहीं आपको इनाम से अधिक धन दिये देता हूँ। तक्षक ने बहुत-सी सम्पत्ति देकर कश्यप को लौटा दिया।​

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श्राप से भयभीत राजा परीक्षित :-

राजा परीक्षित श्राप के कारण अत्यंत परेशान रहने लगे थे, उन्होंने इससे मुक्ति के लिए कई ऋषि मुनियों से उपाय पूछे। किन्तु सभी ने कह दिया की एक ऋषि का श्राप कभी असफल नहीं हो सकता। राजा के मंत्रियों ने उसकी रक्षा के लिए राज्य में पहरा बढ़ा दिया। साँपों को दूर रखने का हर संभव उपाय कर लिया। चारों ओर से सुरक्षित राजा से एक दिन एक ऋषि मिलने आये और अपने साथ कुछ फूल भी उन्हें देने के लिए लाये। उन्हीं फूलों में  'तक्षक' एक कीड़े के छोटे से रूप में छिपा हुआ था। और जैसे ही राजा ने वह फूल ऋषि से लिए तक्षक ने उसे डस लिया, और परीक्षित की मृत्यु हो गयी। परीक्षित के बाद  उसके पुत्र जनमेजय को हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठाया गया। जनमेजय पांडव वंश के आखिरी राजा थे।​

राजा जनमेजय का सर्प मेध यज्ञ :-

जनमेजय अपने पिता की मृत्यु से बहुत आहत था। उसे जब पता चला की उसके पिता को श्राप से मुक्त करने आये ऋषि को नागराज तक्षक ने वापस लौटा दिया तो वो अत्यंत क्रुद्ध हुआ। उसने तक्षक को उसकी इस करतूत के लिए सबक सिखाने का प्रण ले लिया और सम्पूर्ण सर्प जाती को ही समाप्त करने का निश्चय किया। इस हेतु उसने एक बड़े यज्ञ अनुष्ठान का आयोजन किया जिसमे बहुत सारे ऋषियों ने सर्पों के नाम की आहुति डालनी शुरू की।​

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जिस भी सर्प के नाम से आहुति दी जाती उस सर्प की सम्पूर्ण प्रजाति उस हवन कुंड में आकर समाप्त होने लगती। यह अत्यंत विनाशकारी यज्ञ था, जिसके प्रभाव से लगातार सर्प आ-आकर हवन-कुण्ड में गिरने लगे। तक्षक यज्ञ के डर से रक्षा हेतु इंद्र की शरण में पहुंच गया। किन्तु इंद्र ने भी उस यज्ञ की तीव्रता देखते हुए उसे शरण देने से मना कर दिया।​

आस्तीक मुनि का हस्तक्षेप :-

ऐसे में सर्पों का विनाश रोकने के लिए शिवजी के नाग वासुकी ने अपने भांजे, जरत्कारु मुनि के पुत्र, आस्तीक से नाग वंश की रक्षा करने का अनुरोध किया। आस्तीक एक ब्राह्मण 'जरत्कारु मुनि' और तक्षक की बहन 'जरत्कारु' (नागकन्या) के पुत्र थे। ये अत्यंत ज्ञानी थे और वासुकि जी कि आज्ञा से आस्तीक जनमेजय के यज्ञस्थल में जाकर यज्ञ की बेहद प्रशंसा करने लगे। इससे प्रसन्न होकर राजा ने उनको मनचाहा वरदान देने का वचन दिया। इस पर आस्तीक ने प्रार्थना की कि अब आप इस यज्ञ को यहीं समाप्त कर दें।​

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जन्मेजय अपने ही वचन में बंध चुके थे इस कारण उन्होंने उदास मन से आस्तीक की बात मानकर तक्षक को मंत्र-प्रभाव से मुक्ति दी और नागयज्ञ बंद करा दिया। सर्पों ने प्रसन्न होकर आस्तीक को वचन दिया कि जो तुम्हारा श्रद्धासहित नाम लेगा, उसे हम कभी कष्ट नहीं देंगे। जिस दिन सर्पयज्ञ रोका गया था, उस दिन 'पंचमी' थी। अत: आज भी उक्त तिथि को 'नागपंचमी' के रूप में जाता है।​​

 

(स्रोत - सांपो के सम्पूर्ण कुल विनाश के लिए जनमेजय ने किया था ‘सर्प मेध यज्ञ’)

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