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क्यों करते हैं लोग कावड़ यात्रा ?

"चल कांवरिया चल कांवरिया चल कावड़ उठा" गुलशन कुमार का गाया यह भजन सावन के माह में बहुत धूम धाम से स्पीकर्स पर बजता हुआ सुनाई देता है। इस भजन में कांवरिया को उत्साहित किया जा रहा है, परन्तु ये कावड़ और कांवरिया होते क्या हैं? ये क्यों सावन के माह में इतनी चर्चा में आते हैं? और क्या होता है इनका उद्देश्य? ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब आज हम देंगे अपने इस लेख में-

क्या होते हैं कांवरिया :-

कावड़ एक तरह का मटका होता है जिसमे यात्री पवित्र गंगा से जल भर कर लाते हैं और शिवजी का अभिषेक करते हैं। कावड़ में गंगाजल लाने वाले यात्रियों को ही कांवरिया कहा जाता है। सावन के माह में सभी शिवभक्त केसरिया रंग के कपड़ों में नंगे पाँव कावड़ उठाकर बम भोले का उद्घोष करते हुए निकल पड़ते हैं कावड़ यात्रा पर। कावड़ को शिवजी का ही स्वरुप माना जाता है, इसलिए इसे लाने के लिए एक कांवरिया को अत्यधिक नियमों का पालन करना होता है।

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सावन मास में कावड़ यात्रा:-

कावड़ यात्रा सावन का महीना लगते ही शुरू हो जाती है, जिसमे उत्तर भारत में लोग बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। कावड़ यात्री सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल कर अपनी यात्रा पूर्ण करते हैं और हरिद्वार अथवा गंगोत्री से गंगाजल भरकर शिवालयों में शिवजी का अभिषेक करते हैं। चूँकि सावन माह शिवजी का अत्यंत प्रिय माह है, तथा पौराणिक कथाओं के अनुसार इस माह में सभी देवता सो जाते हैं और केवल शिव जाग्रत रहकर अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। तो ऐसे में भक्त भी शिवजी को प्रसन्न करने में कोई कसर नहीं छोड़ते और इसलिए लम्बी यात्रा कर के उनका जल अभिषेक करते हैं।

किसने शुरू की कावड़ यात्रा? :-

कावड़ यात्रा किसके द्वारा शुरू की गयी इसकी कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है, किन्तु पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार समुद्र मंथन के समय समुद्र से निकले हलाहल को शिवजी ने अपने कंठ में धारण कर लिया और नीलकंठ कहलाये। किन्तु हलाहल के दुष्प्रभाव से उन के शरीर की ऊष्मा बढ़ने लगी, शिव की ऊष्मा को शांत करने के लिए देवताओं ने उनके ऊपर गंगा से जलाभिषेक किया जिससे उन्हें शीतलता प्राप्त हुई। कहते हैं तभी से शिवजी पर जलाभिषेक करने की परंपरा प्रारम्भ हो गयी।

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एक दूसरी कथा के अनुसार भगवान परशुराम ने उत्तर प्रदेश में स्थित पुरा महादेव पर कावड़ से जलाभिषेक किया था, जिसके लिए वे गढ़मुक्तेश्वर से गंगा जी का जल लेकर आये थे। और इसीलिए कुछ विशेषज्ञ परशुराम जी को ही कावड़ यात्रा प्रारम्भ करने का श्रेय देते हैं।

 

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