Article

करवा चौथ: क्यों रखा जाता है यह व्रत? जानें व्रत की विधि!

करवा चौथ का मुहूर्त :-

17 अक्तूबर 2019 (गुरुवार)

चंद्रोदय समय - 08:16

करवा चौथ पूजा मुहूर्त- 05:46 से 07:02 (1 घंटा 16 मिनट)

चतुर्थी तिथि आरंभ- 06:48 (17 अक्तूबर 2019)

चतुर्थी तिथि समाप्त- 07:29 (18 अक्तूबर 2019)

करवा चौथ हिन्दू भारतीय महिलाओं के लिए एक अत्यंत फलदायी व्रत है, इस व्रत के लिए महिलाएं बहुत उत्साहित रहतीं हैं। करवा चौथ स्त्री को सौभाग्यवती बनाये रखता है अर्थात इस व्रत से उनके पति को दीर्घायु प्राप्त होती है। यह व्रत कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है।

करवा चौथ की विशेषता :-

यह व्रत मुख्यतः उत्तरी भारत में मनाया जाता है, किन्तु इसके उत्तम फलों के कारण अब यह पूर्ण भारत में प्रचलित हो गया है। इस व्रत को केवल सौभाग्यवती स्त्रियां ही रख सकतीं हैं, तथा यह प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व 4 बजे से प्रारम्भ होता है तथा रात्रि में चंद्र दर्शन और पूजन के बाद संपन्न होता है। अखंड सौभाग्य के लिए स्त्रियों को यह व्रत रखकर गणेश जी की आराधना करनी चाहिए। 

भक्ति दर्शन एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें।

सामान्यतया यह व्रत निराहार तथा निर्जला ही किया जाता है, किन्तु आजकल स्त्रियां इसे अपने परिवार में चली प्रथा के अनुसार ही करतीं हैं। करवा चौथ के व्रत में स्त्रियां दिन भर गणेश जी, माता गौरी तथा शंकर की आराधना करतीं हैं तथा इसके बाद चौथ माता की कथा सुनती हैं। और रात्रि होने पर चंद्र दर्शन के बाद ही अपने पति के हाथों से जल तथा भोजन ग्रहण करतीं हैं। यह व्रत 12 वर्ष अथवा 16 वर्ष तक ही रखा जाता है, किन्तु महिलाएं अपनी इच्छानुसार इस व्रत को आजीवन भी रखतीं हैं। अवधी पूर्ण होने के पश्चात अन्य व्रतों की ही भांति इस व्रत का भी उद्यापन किया जाता है। 

यह भी पढ़ें -  हरतालिका तीज: जानिए क्या हैं इस व्रत को करने के ख़ास नियम!

करवा चौथ पूजन विधि :-

करवा चौथ के दिन स्त्रियों को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि कर लेना चाहिए और उसके बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए। प्रातःकाल 4 बजे से पहले ही सास द्वारा बनाई गयी अथवा भेजी गयी सरगी खानी चाहिए। सरगी में प्रायः मिष्ठान, हलवा, पूड़ी, सेवईं, फल, काजू इत्यादि श्रृंगार के सामान के साथ दी जाती है। सरगी में सास लहसुन तथा प्याज आदि से बने व्यंजन न दें, इस से व्रत का पालन नहीं होता। सरगी करने के बाद से ही निर्जला व्रत शुरू हो जाता है, इसके बाद सीधे रात्रि में ही व्रत पूर्ण होने के बाद भोजन किया जाता है। 

भक्ति दर्शन के नए अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक पर फॉलो करे

इस दिन सारा दिन भगवन के भजन कीर्तन तथा पूजा में ही व्यतीत करना चाहिए। पीली मिटटी से गौरी तथा गणेश जी की स्थापना एक चौकी पर करनी चाहिए, तथा माता गौरी को सुहाग की सामग्री तथा चुनरी भेंट करनी चाहिए। पूजन में सदैव एक जल से भरा हुआ कलश रखें और वायना(भेंट) देने के लिए मिट्टी का टोंटीदार करवा लेना चाहिए। इस करवे में गेहूं तथा उसके ढक्कन में शक्कर का बूरा भर दें। तथा इसके ऊपर दक्षिणा रखें और इस करवे पर एक स्वस्तिक का चिह्न रोली से बनाएं।

अब ''नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभाम्‌। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥'' इस मन्त्र के साथ गौरी तथा गणेश जी की पूजा करनी चाहिए, और फिर कथा पढ़नी अथवा सुननी चाहिए। कथा पूर्ण होने के बाद घर के बुज़ुर्गों के पैर छू कर उनसे आशीर्वाद लेना चाहिए। रात्रि में चंद्रोदय के पश्चात् छननी के प्रयोग से चंद्र को अर्घ्य दें और उसी से चंद्र दर्शन के बाद अपने पति का दर्शन करें। और अपने पति के पैर छूकर उनका भी आशीर्वाद लें और उनके हाथ से जल और प्रसाद ग्रहण करें।

संबंधित लेख :​