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गोवर्धन पूजा: क्या है अन्नकूट का महत्व एवं पूजन विधि?

गोवर्धन पूजा मुहूर्त :-
28 अक्टूबर 2019 (सोमवार)
गोवर्धन पूजा सायंकाल मुहूर्त = 03:23 से 05:36 (2 घंटा 12 मिनट)
प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ = 09:08 (28
अक्टूबर  2019)
प्रतिपदा तिथि समाप्त = 06:13 (29
अक्टूबर  2019)

तिथि: 15, कार्तिक, शुक्ल पक्ष, अमावस्या, विक्रम सम्वत

गोवर्धन पूजा हिन्दुओं का एक खास पर्व है, जो दीपावली के अगले दिन मनाया जाता है। गोवर्धन पूजा को अन्नकूट के नाम से भी जाना जाता है। गोवर्धन पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन मनाई जाती है। यह त्यौहार मानव जीवन का प्रकृति से सम्बन्ध दर्शाता है तथा इसका भारतीय लोकजीवन में अत्यधिक महत्व है। गोवर्धन पूजा उत्तरीय भारत में विशेषतया मनाई जाती है, जिसमे मथुरा और वृन्दावन जैसे शहरों में बहुत भीड़ रहती है। क्योकि गोवर्धन पूजा के समय इन शहरों में विशाल उत्सव होता है।

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प्रत्येक पर्व की भांति इस पर्व की भी अपनी एक लोककथा और मान्यता है। गोवर्धन पूजा में गायों तथा पर्वत की पूजा होती है। शास्त्रों के अनुसार गौ माता गंगा नदी के समान पवित्र और निश्छल होती है। गाय को माँ लक्ष्मी का भी स्वरुप माना जाता है, अर्थात देवी लक्ष्मी जो सुख और वैभव अपने भक्तों को प्रदान करतीं हैं वैसा ही फल गौ माता की सेवा करने से भी मिलता है। गाय भारतवर्ष में बहुत से लोगों का आय का साधन है, इसीलिए हिन्दुओं में गाय को माता का स्थान मिला है। गौ माता अपने दूध से पोषण और स्वास्थ्य प्रदान करती है और इस प्रकार गोवर्धन पूजा के दिन गौमाता की पूजा तथा सेवा से हम उसका ऋण चुकाते हैं।

अन्नकूट :-

अन्नकूट का अर्थ है अन्न का संग्रह, गोवर्धन पूजा में विभिन्न प्रकार के अन्न को वितरित किये जाने के कारण ही इस पर्व को अन्नकूट भी कहा जाने लगा। इस दिन विभिन्न प्रकार के पकवान तथा मिठाई आदि का भगवान को भोग लगाया जाता है। अन्नकूट बनाने के लिए कई तरह की मौसमी सब्जियां, दूध तथा मावे से बने मिष्ठान और चावल का प्रयोग होता है। अन्नकूट में ऋतू सम्बन्धी अन्न-फल तथा सब्जियों का ही प्रसाद बनाया तथा वितरित किया जाता है। गोवर्धन पूजा में भगवान श्री कृष्ण सहित इंद्र देव, अग्नि, वायु तथा जल देवता को भी पूजा जाता है, जिनकी कृपा से धरती पर अनाज उगता तथा बढ़ता है।

गोवर्धन पूजा की विधि :-

इस दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान आदि करके पूजा स्थल को स्वच्छ कर लेना चाहिए। इसके बाद गंगाजल छिड़ककर पूजा के स्थान पर गोबर से गोवर्धन पर्वत की रचना करनी चाहिए। इसके पश्चात् इस पर्वत की रोली, अक्षत, चंदन, जल, दूध, पुष्प आदि से श्रद्धापूर्वक पूजा करनी चाहिए। इसके बाद गायों को स्नान कराकर उन्हें नया वस्त्र ओढ़ा कर उनका भी पूजन करना चाहिए। गायों को इस दिन बना पकवान और मिष्ठान भी खिलाएं। इस के पश्चात् श्री कृष्ण की तथा अन्य देवी देवताओं की भी पूजा करें। इस दिन कई जगह श्री कृष्ण को छप्पन भोग लगाने की भी परंपरा है।

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गोवर्धन पूजा की पौराणिक कथा :-

गोवर्धन पूजा से सम्बंधित एक कथा शास्त्रों में बताई गयी है, यह कथा सम्बंधित है श्री कृष्ण और देवराज इंद्र से। इंद्र स्वाभाव से अभिमानी हैं, इसकी कई कथाएं हमने सुनी हैं, यह कथा भी इंद्रदेव के अभिमान को चूर चूर करने के लिए श्री कृष्ण द्वारा की गयी एक लीला की है। कथा इस प्रकार है-

एक बार सभी बृजवासी सुबह से पूजन की तैयारी में लगे थे, पूजा के लिए उत्तम पकवान और मिष्ठान बनाये जा रहे थे। श्री कृष्ण ने यह सब देखकर नंदबाबा से पूछा की आप सब लोग किसकी पूजा की तैयारी कर रहे हैं। नन्द बाबा ने बताया की सभी बृजवासी देवराज इंद्र की पूजा की तैयारी कर रहे हैं। तब श्री कृष्ण ने दुबारा पुछा की इंद्रदेव की पूजा क्यों कर रहे हैं? नंदबाबा ने कहा, वह वर्षा के देवता हैं, हम उन्हें प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा करते हैं जिससे की वे ब्रिज में पर्याप्त वर्षा करें और यहां अन्न उगे और हमारी गय्या के चरने के लिए पर्याप्त चारा हो। यह सुनकर श्री कृष्ण बोले, तब तो हमें गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योकि वह पर्वत ही हमारी गायों के चरने के लिए चारा उत्पन्न करता है। इंद्र देव को प्रसन्न करने की आवश्यकता क्या है, वर्षा करना तो उनका कर्तव्य है इसलिए आप सब गोवर्धन पर्वत की पूजा कीजिये।

कन्हैया की बातें सुनकर सभी गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए सहमत हो गए, बृजवासियों के इस कार्य से इंद्र खुद को अपमानित अनुभव करने लगे। क्रोध के कारण उन्होंने बृजवासियों को सबक सिखाने की सोची और बृज में तीव्र वर्षा करने लगे। इस मूसलाधार वर्षा से बृज में प्रलय आने लगी और सभी लोग श्री कृष्ण को कोसने लगे की उनके कारण इंद्र क्रोधित हुए हैं। यह सब देखकर कृष्ण ने अपनी मुरली अपनी कमर में डाली और अपनी कनिष्ठा ऊँगली में पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लिया और सभी बृजवासियों को उसके नीचे सुरक्षित कर लिया। समस्त बृज अपनी गाय और बछड़े समेत उस पर्वत के नीचे खड़े हो गए। इंद्रदेव यह देखकर और भी ज़्यादा क्रोधित हो गए और वर्षा और अधिक तीव्र कर दी।

इंद्र के अभिमान को तोड़ने के लिए कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से कहा की पर्वत के ऊपर स्थिर होकर वर्षा की गति को नियंत्रित करें और शेषनाग को मेढ़ बनकर वर्षा के पानी को गोवर्धन की तरफ आने से रोकने का आदेश दिया। इस प्रकार इंद्रदेव ने लगातार सात दिनों तक बृज में तीव्र वर्षा की, किन्तु श्री कृष्ण ने अपनी शरण में सबकी रक्षा की और इंद्र का अभिमान टूट गया। उन्होंने श्री कृष्ण से क्षमा मांगी और कहा की वे भूल गए थे की आप तो स्वयं सृष्टि के पालनहार हैं। इसके पश्चात् श्री कृष्ण ने बृजवासियों समेत गोवर्धन पर्वत की पूजा की।  इस पौराणिक वृतांत के कारण ही गोवर्धन पर्वत की आज भी पूजा की जाती है।

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