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महालक्ष्मी मंदिर कोल्हापुर

महालक्ष्मी मंदिर कोल्हापुर

यह महालक्ष्मी मंदिर महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित है। बताया जाता है कि महालक्ष्मी का यह मंदिर 1800 साल पुराना है और इस मंदिर में आदि गुरु शंकराचार्य ने देवी महालक्ष्मी की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की थी। यही कारण है कि अक्षय तृतीया के दिन कई श्रद्धालु दूर दूर से यहां दर्शन करने आते हैं। इस मंदिर को लेकर ऐतिहासिक मान्यता यह है कि इस मंदिर में देवी महालक्ष्मी को 'अम्बा बाई' के नाम से पूजा जाता है। देवी महालक्ष्मी के इस मंदिर के बारे में दो कहानियां प्रचलित हैं, जो इस प्रकार हैं -  

 

कोल्हापुर महालक्ष्मी की कहानी :-

कोल्हापुर देवी महालक्ष्मी की कहानी कुछ इस तरह है कि एक बार ऋषि भृगु के मन में शंका उत्पन हुई कि त्रिमूर्ती के बीच में कौन सबसे श्रेष्ठ है। इसे जानने के लिए पहले वे ब्रह्मा के पास गए और बुरी तरह उनसे बात की। जिससे ब्रह्मा को क्रोध आ गया। इससे ऋषि भृगु को यह ज्ञात हुआ कि ब्रह्मा अपने क्रोध को नियंत्रित नहीं कर सकते अतः उन्हें श्राप दिया कि उनकी पूजा किसी भी मंदिर में नहीं होगी। इसके बाद वे शिव जी के पास गए लेकिन नंदी ने उन्हें प्रवेश द्वार पर ही यह कह कर रोक दिया कि शिव और देवी पार्वती दोनों एकान्त में हैं। इस पर ऋषि भृगु क्रोधित हुए और शिव जी को श्राप दिया कि उनकी पूजा लिंग के रूप में होगी।

इसके बाद वे विष्णु जी के पास गए और देखा कि भगवान विष्णु अपने सर्प पर सो रहे थे और देवी महालक्ष्मी उनके पैरों की मालिश कर रहीं थी। यह देख ऋषि भृगु क्रोधित हुए और उन्होंने भगवान विष्णु को छाती पर लात मारी। इससे भगवान विष्णु जाग गए और ऋषि भृगु से माफी मांगी और पूछा कि कहीं उन्हें पैरो में चोट तो नहीं लग गयी। यह सुन कर ऋषि भृगु वहां से भगवान विष्णु की प्रशंसा करते हुए वापस चले गए। लेकिन ऋषि भृगु के इस व्यवहार को देख कर देवी महालक्ष्मी क्रोधित हो गयी और उन्हों ने भगवान् विष्णु से उन्हें दंडित करने को कहा। लेकिन भगवान विष्णु इसके लिए राज़ी नहीं हुए।

भगवान विष्णु के बात ना मानने पर देवी लक्ष्मी ने वैकुंठ त्याग दिया और कोल्हापुर शहर चली गयी और देवी पद्मावती के रूप में अवतरित हो गयीं। वहाँ उन्हों ने तपस्या की जिससे भगवान विष्णु ने भगवान वेंकटचलपति रूप में अवतार लिया। इसके बाद उन्होंने देवी पद्मावती के रूप में देवी लक्ष्मी को शांत किया और उनके साथ विवाह किया।

शक्ति पीठों में से एक :-

51 शक्तिपीठ में एक कोल्हपुर शक्तिपीठ है। इसकी कहानी कुछ इस प्रकार है। महादेव के अपमान से क्रोधित हो कर माता सती ने यज्ञ कुंड मे आत्मदाह कर लिया। माता सती के आत्मदाह का आभास होते ही महादेव तड़प उठे और सारा ब्रह्मांड उनकी क्रोधाग्नि मे जलने लगा। तत्पश्चात महादेव यज्ञ स्थान पर प्रकट हुए और उन्होने माता सती के शव को अपनी भुजाओ मे लेकर तांडव आरंभ कर दिया। उनके क्रोध की अग्नि मे सारा संसार जलने लगा और सब कुछ भस्म होने लगा। महादेव को शांत करने का उपाय देवताओ के पास नहीं था ऐसी परिस्थिति मे भगवान विष्णु जी ने अपने सुदर्शन चक्र का प्रयोग करते हुए माता सती के शरीर को 51 भागो मे विभाजित कर दिया जो इस धरती में अलग-अलग जगहों पर जा गिरे और पाषाण के रूप मे स्थापित हो गए। वे सभी स्थान जहाँ पर माता सती के 51 अंग पाषाण के रूप मे स्थापित हुए, आज 51 शक्तिपीठ के नाम से जाने जाते है।

 

मूर्ति :-

महालक्ष्मी की प्रतिमा काली और ऊंचाई करीब 3 फीट लंबी है। मंदिर के एक दीवार में श्री यंत्र पत्थर पर खोद कर चित्र बनाया गया है। देवी की मूर्ति के पीछे देवी की वाहन शेर का एक पत्थर से बनी प्रतिमा भी मौजूद है। देवी के मुकुट में भगवान विष्णु के शेषनाग नागिन का चित्र भी रचाया गया है। देवी महालक्ष्मी के चारों हाथों में अमूल्य प्रतीक वस्तुएँ है। निचले दाहिने हाथ में निम्बू फल धारण किये (एक खट्टा फल), ऊपरी दाएँ हाथ में गदा के साथ (बड़ी कौमोदकी जो अपने सिर से जमीन को छुए), ऊपरी दाई हाथ में एक ढाल (खेटका) और निचले बाएँ हाथ में एक कटोरे लिए (पानपात्र) देखें जातें है। अन्य हिंदू पवित्र मंदिरों में देवीजी पूरब या उत्तर दिशा को देखते हुए मिलते हैं लेकिन यहाँ देवी महालक्ष्मीजी पश्चिम दिशा को निरीक्षण करते हुए मिलते है। वहाँ पश्चिमी दीवार पर एक छोटी सी खुली खिड़की मिलती है, जिसके माध्यम से सूरज की किरणें हर साल मार्च और सितंबर महीनों के 21 तारीख के आसपास तीन दिनों के लिए देवीजी के मुख मंडल को रोशन करते हुए इनके पद कमलों में शरण प्राप्त करते हैं।

इसी मंदिर के अन्दर नवग्रहों, भगवान सूर्य, महिषासुर मर्दिनी, विट्टल रखमाई, शिवजी, विष्णु, भवानी आदी देवी देवताओं के पूजा स्थल भी दिखाई देते हैं। इन प्रतिमाओं में से कुछ 11 वीं सदी की हो सकतीं हैं, जबकि कुछ हाल ही  की हैं। इसके अलावा आंगन में स्थित मणिकर्णिका कुंड के तट पर विश्वेश्वर महादेव मंदिर भी स्थित हैं।

 

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