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क्यों तोड़ा श्री कृष्ण ने अपना प्रण! (why did krishna broke his pledge )

युद्ध शुरू होने से पूर्व बलराम जी ने अपने प्रिय शिष्य दुर्योधन को वचन दिया था कि वे और कृष्ण किसी भी पक्ष की ओर से शस्त्र नहीं उठायेंगे। अपने भ्राता के वचन का मान रखने के लिए श्री कृष्ण ने भी युद्ध में शस्त्र न उठाने का प्रण लिया। और अर्जुन का सारथि बनकर केवल पांडवों का मार्गदर्शन किया।​

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लेकिन युद्ध में एक समय ऐसा आया जब श्री कृष्ण अपना प्रण भूल कर अपने चक्र से भीष्म पितामह को मारने के लिए अपने रथ से कूद पड़े। आखिर ऐसा क्या हुआ की हर समय संयम और धैर्य धारण करने वाले कान्हा को इतना क्रोध आया की वे अपनी प्रतिज्ञा भूल गए? क्यों वे रण  भूमि में आये और क्यों भीष्म पितामह को मरने के लिए दौड़े ? आइये जानते हैं इस लेख में –​

रणभूमि में व्यूह रचना :-

यह महाभारत युद्ध का तीसरा दिन था, पितामह दुर्योधन के आरोप से अत्यंत क्रोधित और विचलित हो गए थे। दुर्योधन ने आरोप लगाया था कि पितामह पांडवो का पक्ष ले रहे हैं इसीलिए उनको मारना नहीं चाहते। ऐसा करके वे कुरु साम्राज्य से छल कर रहे हैं। यह सुनकर भीष्म ने प्रतिज्ञा  कर ली कि वे अब पांडवों पर कोई दया नहीं दिखायेंगे। ​

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इसलिए उन्होंने युद्ध के तीसरे दिन से ही पांडवों की सेना का संहार करना शुरू कर दिया। उन्होंने इतना भयानक युद्ध किया कि इस दिन पांडव सेना के पाँव उखड गए। भीष्म की व्यूह रचना, जिसमे द्रोणाचार्य, कृपाचार्य तथा अश्वथामा जैसे योद्धा थे, के प्रतिउत्तर में पांडवों द्वारा रचा गया व्यूह जल्द ही नष्ट हो गया और पांडव सेना में भगदड़ मच गयी। ​

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अर्जुन और भीष्म का युद्ध :-

पितामह की भीष्म प्रतिज्ञा सभी जानते हैं, जब वे कोई वचन देते हैं तो उसे ज़रूर निभाते हैं। ऐसा ही वचन वे दुर्योधन को दे चुके थे, पांडवों के संहार का। इसलिए उनके युद्ध कौशल के आगे टिकना किसी के बस में नहीं था। भीष्म अपने बाणों की वर्षा से पांडव सेना को चीरते हुए आगे बढ़ रहे थे और पांडवों की सेना पत्तों की भांति ढह रही थी। ​

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पांडवों का ऐसे विनाश देखकर श्री कृष्ण ने अर्जुन को समझाया की यदि वो ऐसे हो मोह वश युद्ध करेगा तो अवश्य ही अपनी हार को निमंत्रण देगा। यह सुनकर अर्जुन ने अपना रथ भीष्म पितामह के सामने ले जाने के लिए कहा। कृष्ण अर्जुन को भीष्म के सामने ले आये। अर्जुन ने शीघ्र ही अपने बाण से पितामह का धनुष काट दिया। किन्तु पितामह दूसरा धनुष लेकर युद्ध करने लगे। भीष्म ने अपने तीक्ष्ण बाणों से अर्जुन तथा कृष्ण को घायल कर दिया। ​

कृष्ण और पितामह की वार्ता :-

पितामह को ऐसे युद्ध करते हुए देखकर कृष्ण ने उन्हें तंज कसा, कि अपने ही पौत्र और पड़पोत्रों से युद्ध करते हुए आप समर्थ योद्धा नहीं बल्कि एक निर्बल और डरे हुए साधारण पुरुष लग रहे हैं। यदि आपमें साहस होता तो आप शस्त्रों का त्याग कर देते और अपने पौत्रों के वध के स्थान पर अपने प्राणों का त्याग कर देते।​

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पितामह ने दुखी मन से बोला कि वे अपने वचन से बंधे हुए हैं, इसलिए केवल अपना धर्म निभा रहे हैं। किन्तु कृष्ण ने उनके धर्म को ही मिथ्या बोल दिया, उन्होंने कहा धर्म मनुष्य को बांधता नहीं वरन मुक्ति देता है। अवश्य ही आपका धर्म मिथ्या है।​

क्रोधित भीष्म और कृष्ण :-

इतना सुनते ही भीष्म क्रोधित हो गए, उन्होंने क्रोध भरे स्वर में कृष्ण से कहा कि अपने पिता को दिए हुए वचन को निभाने के लिए उन्होंने बहुत त्याग किये और जीवन में एक क्षण के लिए भी अधर्म नहीं किया। उन्होंने कृष्ण की बात का प्रतिकार करते हुए कहा, कि उनका धर्म सत्य है इसलिए संसार में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता।​

यह सुनते ही कृष्ण भी क्रोधित हो गए, उन्होंने हुंकार भरते हुए कहा कि वे उन्हें पराजित कर सकते हैं।  इस पूरे संसार में ऐसा कोई वरदान अथवा श्राप नहीं जिसे वे निष्फल न कर दें। यह बोलकर वे अपने रथ से कूद गए।​