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क्यों थे मामा शकुनि इतने धूर्त ? (Why was mama shakuni so cunning? )

महाभारत काल के सबसे चालबाज़ किरदारों में सर्वप्रथम हैं मामा शकुनी। मामा शकुनि ने ही इस महा युद्ध के बीज बोये थे। लेकिन महाभारत के इतने विशेष पात्र के विषय में जानकारी बहुत सिमित है, इनके इतना क्रूर होने के विषय में एक कहानी प्रचलित है, यद्यपि इस कहानी की कोई प्रमाणिकता नहीं है, क्योकि ये वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत में उपलब्ध नहीं है। यह कहानी केवल लोक कथाओं के द्वारा ही प्रस्तुत की जाती है।

गांधारी की कुंडली :-

गांधारी के जन्म के पश्चात् उसकी राजज्योतिषों द्वारा कुंडली तैयार करवाई गयी, किन्तु उसमे एक दोष निकल आया। ज्योतिषाचार्यों ने गांधार राज को बताया कि कन्या के भाग्य में दो विवाह हैं, उसके पहले पति की मृत्यु निश्चित है। यह सुनते ही घरवाले परेशान हो गए, इसलिए उन्होंने गांधारी का विवाह एक बकरे के साथ करा कर उसकी बलि दे दी। ऐसा करने से गांधारी के पहले पति की मौत हो गयी और दूसरे पति की आयु सुनिश्चित हो गयी। ​

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धृतराष्ट्र का विवाह प्रस्ताव :-

जब गांधारी विवाह योग्य हुई तब उसके रूप और गुणों की चर्चा दूर दूर तक होने लगी। इसी कारण माता सत्यवती ने भीष्म को आदेश दिया कि वे गांधार जाकर गांधारी के लिए धृतराष्ट्र के विवाह का प्रस्ताव दें। भीष्म बहुत शक्तिशाली थे और उनसे युद्ध के भय से गांधारी के माता पिता इस विवाह के लिए मान गए। जब गांधारी को धृतराष्ट्र की दृष्टिहीनता का पता चला तो वह भी अपने माता पिता के वचन का मान रखने के लिए विवाह को तैयार हो गयी। किन्तु शकुनि को यह स्वीकार नहीं था, वह अपनी बहन से बहुत प्यार करता था और नहीं चाहता था की उसकी एकलौती बहन एक अंधे व्यक्ति से विवाह करे। किन्तु शकुनि को यह समझा दिया गया की यदि विवाह नहीं हुआ तो समस्त राज्य युद्ध की भेंट चढ़ जायगा। इस प्रकार यह विवाह संपन्न हो गया। ​

गांधार नरेश पर आक्रमण :-
किन्तु किसी प्रकार विवाह के पश्चात् धृतराष्ट्र को गांधारी के विधवा होने की बात पता चल गयी, वह क्रोधित हो गया। क्रोध में उसने गांधार पर आक्रमण करवा दिया, और राज परिवार के सभी सदस्यों को कारागार में डलवा दिया। धृतराष्ट्र ने उन्हें भूख से तड़पा-तड़पाकर मारने का निश्चय किया, क्योकि युद्ध के बंदियों को मृत्युदंड देना धर्म के विरुद्ध था।​ 

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शकुनि को जीवित रखने का निश्चय :-

कारागार में केवल थोड़ा ही अन्न उनको वितरित किया जाता था। उसकी भी मात्रा समय के साथ साथ और काम होती चली गयी। सभी बंधकों ने  धृतराष्ट्र से प्रतिशोध लेने का निश्चय किया और केवल एक ही सदस्य को जीवित रखने के लिए सारा अन्न उसे ही देने का वचन दिया। क्योकि शकुनि उन सब में सबसे अधिक बुद्धिमान था इसलिए शकुनि को ही जीवित रखने का फैसला हुआ। धीरे धीरे सभी बंधक मरते गए  और देखते ही देखते शकुनि के सामने उसका सारा परिवार समाप्त हो गया। ​

पासे का निर्माण :-
अपने अंतिम क्षणों में शकुनि के पिता ने उससे कहा कि उसकी मौत के पश्चात उनकी अस्थियों की राख से वह एक पासे का निर्माण करे। यह पासा सिर्फ शकुनि के कहे अनुसार काम करेगा और इसकी सहायता से वह कुरुवंश का विनाश कर पाएगा। जब कौरवों में वरिष्ठ युवराज दुर्योधन ने यह देखा कि केवल शकुनि ही जीवित बचे हैं तो उन्होंने पिता की आज्ञा से उसे क्षमा करते हुए अपने देश वापस लौट जाने या फिर हस्तिनापुर में ही रहकर अपना राज देखने को कहा। शकुनि ने हस्तिनापुर में रुकने का निर्णय लिया।

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शकुनि के षड्यंत्र :-
शकुनि ने हस्तिनापुर मैं सबका विश्वास जीत लिया और 100 कौरवों का अभिवावक बन बैठा। अपने विश्वासपूर्ण कार्यों के चलते दुर्योधन ने शकुनि को अपना मंत्री नियुक्त कर लिया। सर्वप्रथम उसने धृतराष्ट्र को अपने वश में करके धृतराष्ट्र के भाई पांडु के विरुद्ध षड्यंत्र रचने और राजसिंहासन पर धृतराष्ट्र का आधिपत्य जमाने को कहा। फिर धीरे-धीरे शकुनि ने दुर्योधन को अपनी बुद्धि के मोहपाश में बांध लिया। शकुनि ने न केवल दुर्योधन को युधिष्ठिर के खिलाफ भड़काया बल्कि महाभारत के युद्ध की नींव भी रखी। उसके लिए उसने दुर्योधन को अपना मोहरा बना लिया था। शकुनि हर समय बस मौकों की तलाश में रहता था जिसके चलते कौरव और पांडवों में भयंकर युद्ध छिड़ें और कौरव मारे जाएं। जब युधिष्ठिर हस्तिनापुर का युवराज घोषित हुआ, तब शकुनि ने ही लाक्षागृह का षड्यंत्र रचा और सभी पांडवों को वारणाव्रत में जिंदा जलाकर मार डालने का प्रयत्न किया। शकुनि किसी भी तरह दुर्योधन को हस्तिनापुर का राजा बनते देखना चाहता था ताकि उसका दुर्योधन पर मानसिक आधिपत्य रहे और वह  दुर्योधन की सहायता से भीष्म और कुरु कुल का विनाश कर सके अतः उसने ही पांडवो के प्रति दुर्योधन के मन में बैर भाव जगाया और उसे सत्ता का लालसी बना दिया।
द्यूत-क्रीड़ा का आयोजन, द्रौपदी का अपमान, पांडवों का वनवास तथा अज्ञातवास आदि जैसे कितने ही षड्यंत्र मामा शकुनि ने पांडवों और कौरवों के बीच युद्ध की दृष्टि से रचे। अंत में युद्ध में कौरवों के वंश का नाश तो हुआ ही शकुनि भी सहदेव के हाथों मारा गया। 

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