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गोवत्स द्वादशी: पुत्र कामना के लिए रखा जाता है गौमाता का यह व्रत!

गोवत्स द्वादशी मुहूर्त :-

25 अक्टूबर 2019 (शुक्रवार)

गोवत्स द्वादशी पूजा का समय = 05:38 से 08:13

अवधि = 2 घण्टे 35 मिनट

तिथि : 12, कार्तिक, कृष्ण पक्ष, द्वादशी, विक्रम सम्वत

हिन्दू धर्म में गाय को माता के समान माना जाता है, क्योकि गाय पृथ्वी पर सभी का पोषण करती है। गौ माता पृथ्वी का भी प्रतीक है जिसमे समस्त देवी देवता तथा तीर्थ निवास करते हैं। स्वयं श्री कृष्ण भी गाय के उद्धार के लिए गोकुल में आये थे और सबको उनकी महत्ता बताई थी। ​

गोवत्स एकादशी का महत्व :-

कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी को गोवत्स द्वादशी के रूप में मनाया जाता है। गोवत्स द्वादशी में गौ माता की पूजा करने का विधान है इसलिए इस दिन गाय और उसके बछड़े की सेवा की जाती है। इस वर्ष यह तिथि 25 अक्टूबर 2019 को पड़ेगी इसलिए इस दिन गोवत्स द्वादशी मनाई जायगी। यदि घर में गाय नहीं है तब आस पास की ही किसी गाय की पूजा करनी चाहिए। किन्तु यदि घर के आस पास भी गाय नहीं तब आप मिट्टी से गाय और बछड़ा निर्मित कर उसकी पूजा कर सकते हैं। इस दिन गाय के दूध से निर्मित किसी भी वस्तु का सेवन नहीं करना चाहिए। यह व्रत पुत्र की रक्षा और पुत्र प्राप्ति की मनोकामना पूर्ण होने के लिए भी रखा जाता है।​ 

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गोवत्स द्वादशी पूजन विधि:-

इस दिन प्रातः काल जल्दी उठकर पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करें, यदि आस पास नदी न हो तो घर पर ही गंगाजल डाल के स्नान कर लें। इस दिन ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए तथा व्रत का संकल्प लेना चाहिए। व्रत में एक समय ही भोजन करने का नियम है। द्वादशी के दिन गाय को बछड़े सहित स्नान कराया जाता है और नविन वस्त्र ओढ़ाया जाता है। तत्पश्चात दोनों की रोली, चंदन तथा पुष्पों से पूजा करनी चाहिए।

इसके पश्चात् गाय और बछड़े को पुष्प माला पहनाएं व ताम्बे के पात्र में सुगंध, अक्षत, तिल, जल और फूल मिलाकर निम्न मन्त्र का उच्चारण करें-

क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृते|

सर्वदेवमये मातर्गृहाणार्घ्य नमो नम:||

इस दिन गाय को उड़द से बने हुए भोजन खिलाएं और प्रार्थना हेतु निम्न मन्त्र दोहराएं-

सुरभि त्वं जगन्मातर्देवी विष्णुपदे स्थिता |

सर्वदेवमये ग्रासं मया दत्तमिमं ग्रस ||

तत: सर्वमये देवि सर्वदेवैरलड्कृते |

मातर्ममाभिलाषितं सफलं कुरु नन्दिनी ||

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गोवत्स द्वादशी की कथा:-

प्राचीन काल में भारत के सुवर्णपुर नामक नगर में एक राजा था, उसका नाम था देवदानी। देवदानी की दो पत्नियां थीं, सीता और गीता। सीता की एक भैंस थी, जिसे वो अत्यंत प्रेम देती थी। इसी प्रकार गीता ने एक गाय पाली थी और वह भी उस से बड़ा प्रेम करती थी। एक दिन गाय को बछड़ा हुआ, वो बछड़ा अत्यंत सुन्दर था। धीरे धीरे सभी उस बछड़े से अत्यंत प्रेम करने लगे और सदैव गाय और उसके बछड़े के लिए लोग कुछ न कुछ खाने के लिए लाने लगे। यह देख सीता उस बछड़े से ईर्ष्या करने लगी और एक दिन मौका पा कर उसने उस बछड़े को काट दिया और अनाज के बीच छुपा दिया।

इस से उसे गौहत्या का पाप लग गया, अगले दिन राजा जब भोजन करने बैठे तब अचानक आसमान से रक्त और मांस की वर्षा होने लगी। राजा की भोजन की थाली भी रक्त से सन गयी यह देख राजा समझ गया की उसके राज्य में किसी ने बहुत बड़ा पाप किया है। तभी एक आकाशवाणी हुई की, 'हे राजन! तेरी पत्नी ने एक बछड़े की हत्या की है। इसी कारण तेरे राज्य में संकट आया है, यदि इसका पश्चाताप नहीं किया गया तो तुम्हारा राज्य समाप्त हो जायगा।' जब सीता से पुछा गया तो उसने अपना दोष स्वीकार कर लिया और उसे अपने किये पर बहुत दुःख हुआ। राजा ने फिर राज पुरोहित को बुलाकर इसका उपाय पूछा तो पुरोहित ने बताया की गोवत्स द्वादशी के दिन व्रत कर के इसका पश्चाताप किया जा सकता है।

अगले दिन गोवत्स द्वादशी थी, राज्य में सभी लोगो ने व्रत किया और गौ माता का पूजन किया। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से वह बछड़ा जीवित हो गया और अनाज के ढेर से निकल आया। इस से रानी का गोहत्या का पाप भी धुल गया।

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